Tuesday, 4 December 2018

Gita Quiz Dated: 04.12.2018

International Gita Mahotsav
 Gita Quiz में आज का प्रश्न है
 *गीता में अर्जुन तो श्री कृष्ण से बहुत प्रश्न करते हैं लेकिन श्री कृष्ण भी अर्जुन से प्रश्न पूछते है। गीता में यह एक मात्र शलोक किस अध्याय में है जिसमें श्री कृष्ण अर्जुन से प्रश्न करते हैं।

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 कुरूक्षेत्र की पृष्ठभूमि में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था । इसमें भगवान् श्री कृष्ण ने ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, शरणागत योग आदि का वर्णन करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता के 18 वें अध्याय के 72 वें श्लोक में पूछा था -

 *कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
 कच्चिदज्ञान सम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ।।*
             
 हे पार्थ ! ( अर्जुन ) क्या इस ( गीताशास्त्र ) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया?
और हे धनञ्जय ! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?

 भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कहा गया यह अन्तिम श्लोक है । भगवान् ने इसमें दो प्रश्न किये हैं -

 पहला : एकाग्रचित्त से श्रवण करने के सम्बन्ध में तथा दूसरा: अज्ञान जनित मोह नष्ट होने के सम्बन्ध में । इसके ठीक अगले अर्थात् 73 वें श्लोक में अर्जुन उत्तर देता है -

 नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
 स्थितोअस्मि गतसन्देहः करिश्ये वचनं तव ।।

 हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संषय-रहित होकर स्थित हूँ । अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा ।

इससे तो स्पष्ट होता है कि अर्जुन ने पहले प्रश्न अर्थात् ‘क्या इसे तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया’ का उत्तर नही देकर केवल द्वितीय प्रश्न का ही उत्तर दिया । इसका क्या कारण है यह तो भगवान् तथा स्वयं अर्जुन ही जानते हैं परंतु हमें जो इसका उत्तर प्राप्त हुआ उसकी विवेचना प्रमाण सहित देने की कोशिश करते हैं -

 भगवान् कृष्ण, अर्जुन के सखा भी हैं तो गुरू भी। गीताशास्त्र में एक-एक शब्द विशाल तथा गंभीर अर्थ को समेटे हुए हैं । कुछ भी हो भगवान श्रीकृष्ण ने अगर प्रश्न रखा है तो उसका कुछ कारण तो जरूर ही होगा । भगवान् इस सृष्टि के अद्भुत चितेरे हैं । यह गुरू ही समझ सकता है कि उनका शिष्य उपदेशों को हृदयंगम कर रहा है या नहीं चाहे शिष्य कितना भी चतुराई कर ले।

 यों तो गीता के अंतिम श्लोक अर्थात् (18/78) में संजय अपनी सम्मति देते हुए कहते हैं-
             
 यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
 तत्रश्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा  नीतिर्मतिर्मम ।।

 हे राजन् ! जहाँ योगेश्वर भगवान् श्री कृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है-ऐसा मेरा मत है । हम देखते हैं कि संजय की यह निर्णय सही साबित होता है । परंतु भगवान के प्रश्न-  ‘ कच्चिदेतच्ध्रुत पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा '  - हे पार्थ ! क्या इस (गीता शास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया ? यह प्रश्न युद्ध पश्चात् भी अनुत्तरित रहा। भगवान् अपने प्रश्न को दुहराते नहीं हैं । अर्जुन के जीवन में ही यह लघु प्रश्न फिर खड़ा हो गया। जिस दूसरे प्रश्न का उत्तर भी दिया था‘ 
‘ नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा'  -अर्थात् मेरा मोह नष्ट हो गया और मैने स्मृति प्राप्त कर ली’ वह भी गलत ही साबित हुआ क्योंकि अभिमन्यु की मृत्यु पर अर्जुन मोहग्रस्त हो गया था । अर्जुन ने जिस बुद्धि और मन से मोह नष्ट होने की बातें कहीं थी वह शुद्ध नहीं था अर्थात् मोहावृत्त ही था । परंतु अर्जुन को ऐसा लग रहा था कि वह मोह से मुक्त हो गया । आखिर भगवान तो सर्वान्तर्यामि हैं उन्हें सब कुछ पता था अतः उन्होने ऐसा प्रश्न किया था। महाभारत के आश्वमेधि के पर्व के अन्तर्गत अनुगीता नामक उपपर्व के उत्तरगीता में अर्जुन खुद ही कहते हैं :
             
‘ यत तद् भगवता प्रोक्तं पुरा केशवसौहृदात् ।
 तत् सर्वे पुरूषव्याघ्र नष्टं में भ्रष्टचेतसः
               
किंतु केशव ! आपने सौहार्दवश पहले मुझे जो ज्ञान का उपदेश दिया था, मेरा वह सब ज्ञान इस समय विचलित चित्त हो जाने के कारण नष्ट हो गया (भूल  गया) है । भगवान् को ये बातें अप्रिय लगीं -
             
' नूनमश्रद्धानोअसि दुर्मेधा हयसि पाण्डव ।'
                पाण्डुनंदन ! निश्चय ही तुम बड़े श्रद्धाहीन हो, तुम्हारी बुद्धि बहुत मंद जान पड़ती है ।
             
                इन प्रसंगों से स्पष्ट है कि पार्थ ने अपने पहले प्रश्न का उत्तर इसलिए नहीं दिया था कि उन्होने एकाग्र चित्त से गीताशास्त्र का श्रवण नहीं किया था । ये बातें भगवान श्रीकृष्ण को भी पता थी अतः एक गुरू होने के नाते उन्होंने पार्थ से ऐसा प्रश्न किया था । उस समय ऐसा प्रश्न करने के पीछे भगवान् का यही मंतव्य था कि अगर पार्थ फिर से पूछें तो मैं अभी ही इसको दुहरा दूँगा क्योंकि वे उस समय योगारूढ़ होकर स्थित थे । परंतु ऐसा न हो सका और फिर उन्होंने अर्जुन के कल्याणार्थ उत्तम गति प्रदान करने में सक्षम उसी परमात्म तत्त्व को भिन्न रूप से वर्णित किया उसी को   ‘ उत्तरगीता ’  कहते हैं |

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