अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव 2024 में शिल्पकारों ने महिलाओं के लिए लेदर से बने हैंडबैग और पुरुषों के लिए पर्स पेश किए हैं, जो महोत्सव के मुख्य आकर्षण बन चुके हैं। प्योर लेदर पर्स की कीमत 1000 रुपए और लेडीस हैंडबैग की कीमत 2500 रुपए है।
इस महोत्सव में आने वाले पर्यटक इन शानदार उत्पादों को देखकर आकर्षित हो रहे हैं। शिल्पकारों का कहना है कि गीता महोत्सव का माहौल और स्वच्छता अन्य मेलों से कुछ अलग ही है, यही कारण है कि वे हर साल इस पावन स्थल पर आते हैं। आप भी इस अवसर का लाभ उठाएं और इन खूबसूरत उत्पादों का आनंद लें!
शिल्पकारों की मिट्टी की कला ने महोत्सव में आए पर्यटकों को दी एक नई दिशा। वे न केवल अपना स्वरोजगार स्थापित कर रहे हैं, बल्कि दूसरों को भी सिखा रहे हैं अपना पुश्तैनी काम।
अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में शिल्पकार ब्रह्म सरोवर के तट पर अपने मिट्टी के बर्तनों को बेचने के साथ-साथ इस कला में पारखी बना रहे हैं। उनके लिए मिट्टी के बर्तन बनाना एक पारंपरिक काम है, जिसे उन्होंने आधुनिकता के साथ जोड़ते हुए और आकर्षक बना दिया है।
स्वरोजगार का प्रेरक संदेश:
यह शिल्पकार नए-नए आकारों में मिट्टी के बर्तन बनाकर और पॉलिश करके इन्हें और आकर्षक बना रहे हैं। उन्होंने आज के बाजार के हिसाब से अपनी कला को प्रस्तुत किया है, साथ ही दूसरों को भी यह कला सिखा रहे हैं। अब कोई भी इनके पास आकर मिट्टी के बर्तन बनाने की कला सीख सकता है।
यह शिल्पकार विगत कई सालों से ब्रह्म सरोवर के तट पर अपनी प्रदर्शनी लगाकर इन बर्तनों को सेल भी कर रहे हैं। इसके साथ ही वे मिट्टी के मुखौटे, तुलसी गमले, रिंग बेल फ्लावर पॉट, वॉटर बॉल आदि भी बना रहे हैं।
आधुनिकता और परंपरा का अद्भुत मिश्रण:
पहले मिट्टी के बर्तन हाथ से बने चाक पर बनाए जाते थे, लेकिन अब वे बिजली के चाक पर काम करते हैं, जिससे उनका काम तेज और सटीक होता है। इस बदलाव से उन्होंने अपने काम को और भी आकर्षक और किफायती बना दिया है।
इस वर्ष, अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव 2024 ने अपनी पहुँच को और भी व्यापक किया। पहली बार, जन संपर्क विभाग के प्रयासों से देश के पांच प्रमुख तीर्थ स्थलों पर महोत्सव के कार्यक्रमों का ऑनलाइन प्रसारण किया गया।
उपायुक्त नेहा सिंह ने इस पहल को लेकर बताया कि, 5 दिसंबर से 11 दिसंबर तक के महोत्सव के कार्यक्रमों को ऑनलाइन माध्यमों जैसे वेबसाइट, ट्विटर, इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि के जरिए श्रद्धालुओं तक पहुँचाया गया। इसके अलावा, इस वर्ष प्रचार रथों के माध्यम से, गीता महोत्सव का लाइव प्रसारण श्री जगन्नाथ मंदिर (ओडिशा), श्री बांके बिहारी (वृंदावन), कृष्ण जन्मभूमि (मथुरा), द्वारकाधीश मंदिर (गुजरात) और टिकाना मंदिर (जयपुर) पर किया गया।
इन प्रचार रथों पर बड़ी एलईडी स्क्रीन के साथ इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई गई थी, जिससे श्रद्धालु लाइव कार्यक्रमों का आनंद ले सके। इन कार्यक्रमों में गीता पाठ, महाआरती, सांस्कृतिक कार्यक्रम और दीपदान जैसे प्रमुख आयोजन शामिल थे।
यह पहल लाखों श्रद्धालुओं को कुरुक्षेत्र में उपस्थित हुए बिना भी महोत्सव के भव्य कार्यक्रमों से जोड़ने में सफल रही।
महानिदेशक के आदेशानुसार, पांच प्रमुख तीर्थ स्थलों पर आईपीआरओ की ड्यूटी भी लगाई गई थी, जिनके माध्यम से हर कार्यक्रम का प्रसारण सुनिश्चित किया गया।
पुरानी चीजें, जैसे कि टेलीविजन, रेडियो, टेलीफोन, आयरन, और अन्य घरेलू सामान, न केवल भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं, बल्कि इनसे जुड़ी यादें और किस्से हमें हमारे अतीत की सादगी और तकनीकी प्रगति की ओर ले जाते हैं। इन वस्तुओं ने हमारे जीवन में एक समय पर अहम भूमिका निभाई थी और हमें उस दौर की जीवनशैली, रिश्तों और संवाद के तरीकों का अहसास दिलाया।
पुराना टेलीविजन, जो एक समय में परिवारों की बैठक का केंद्र हुआ करता था, वह आज के डिजिटल युग में भी हमारी यादों में बस गया है। वहीं, पुराने रेडियो ने अपने गीतों और समाचारों से हम सभी को जोड़ने का कार्य किया। पुराने टेलीफोन ने संवाद की सरलता और मित्रों-परिवार से जुड़ने की भावना को जीवित रखा। और पुराना आयरन, जो गर्म होने में समय लेता था, वह न केवल हमें हमारे रोज़मर्रा के कार्यों की याद दिलाता है, बल्कि हमारे जीवन के सरल लेकिन सशक्त दिनों की भी याद दिलाता है।
इन पुराने सामानों ने हमें यह समझने का अवसर दिया कि कैसे समय के साथ तकनीकी बदलावों ने हमारे जीवन को सशक्त किया, लेकिन इनमें से प्रत्येक वस्तु की अपनी एक विशेष महत्ता और जगह है। महोत्सव में इन पुरानी चीजों ने हमें हमारे अतीत से जोड़ते हुए, समय के साथ हमारी यात्रा और विकास की महिमा का अहसास कराया।
पुरानी हाथचक्की, जो भारतीय गांवों में अनगिनत पीढ़ियों तक अनाज पीसने का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, ने महोत्सव में अपनी अनूठी उपस्थिति से एक सशक्त संदेश दिया। यह साधारण, लेकिन प्रभावशाली यंत्र न केवल हमारी पारंपरिक जीवनशैली को याद दिलाता है, बल्कि उस मेहनत और समर्पण का प्रतीक भी है, जो भारतीय किसान अपने दैनिक कार्यों में लगाते थे।
हाथचक्की के आसपास की हर कहानी, उसकी आवाज़, और उसका कार्यभार भारतीय कृषि जीवन और उसके महत्व को प्रदर्शित करता है। यह यंत्र न केवल कृषि और भोजन की अनिवार्यता को दर्शाता है, बल्कि हमारे परंपरागत साधनों और उनके साथ जुड़ी सरलता और संतुलन को भी उजागर करता है।
इस महोत्सव में पुरानी हाथचक्की ने दर्शकों को भारतीय संस्कृति की जड़ों से जोड़ते हुए, हमारी समृद्ध ग्रामीण धरोहर और मेहनत के महत्व का अहसास कराया। यह एक शानदार उदाहरण था कि कैसे तकनीक और परंपरा का संगम हमारी संस्कृति को मजबूत बनाता है।
गत्ते और कागज से बनी टोकरी और कठपुतलियाँ भारतीय पारंपरिक हस्तशिल्प की एक अनूठी मिसाल हैं, जिनमें सरलता और सुंदरता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इन कलाओं में हर पंखे और मोड़ में कलाकार की कल्पना और हुनर की झलक दिखाई देती है। विशेष रूप से कागज और गत्ते से बनी कठपुतलियाँ, जो रंग-बिरंगे कपड़ों में सजी हुई थीं, महोत्सव में दर्शकों को एक अलग ही दुनिया में ले गईं।
टोकरी का शिल्प भारतीय ग्रामीण जीवन का अनिवार्य हिस्सा रहा है, और यह हस्तशिल्प ने महोत्सव में हमारी सांस्कृतिक धरोहर को और भी समृद्ध किया। वहीं कठपुतलियों की प्रस्तुति ने भारतीय लोक कला की जीवंतता को दर्शाया और बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर उम्र के दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
महोत्सव में इन हस्तशिल्पों ने न केवल हमारे पारंपरिक कला रूपों को जीवित रखा, बल्कि भारतीय शिल्प की विविधता और गहराई को भी दुनिया भर में पहचाना।
मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी सुमन सैनी ने कुरुक्षेत्र स्थित ब्रह्मसरोवर पर आयोजित मेले का अवलोकन किया। इस अवसर पर उन्होंने मेलें में आने वाले श्रद्धालुओं की श्रद्धा और उत्साह का भी अनुभव किया और वहां के धार्मिक वातावरण का पूरा आनंद लिया।
सुमन सैनी जी ने इस पवित्र स्थान पर आकर न केवल आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया, बल्कि उन्होंने मेले में आए श्रद्धालुओं से बातचीत की और उनकी धार्मिक भावना को भी सराहा। इस अवसर पर लोगों की भक्ति और समर्पण को देखकर उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता हुई।
यह आयोजन कुरुक्षेत्र की पवित्रता और सांस्कृतिक धरोहर को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाने का काम कर रहा है।